विधाता नही पर बनाता हूँ घर सबका
विधाता नहीं पर बनाता हूँ घर सबका...
जताता नहीं पर है ये वतन मेरा भी
हे ! हुकूमत-ए-वतन , कहाँ मेरा आशियाना??""
कितना अजीब है यह संसार जो ऊँची-ऊंची मीनारें सभ्यता और विकास की बुनियादें होती हैं,किसी राष्ट्र के स्वाभिमान का प्रतीक होती हैं,किसी इंसान के अहम की पराकाष्ठा होती हैं और किसी हुकूमत की अथाह बेमानियां होती हैं पर इन सबसे परे एक बेबसी और लाचारियों के बीच इसी संसार का प्राणी अपने बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करते-करते वक्त-बेवक्त गत हो जाता है फिर भी हमें अपनी लालसाएं और महत्वकांक्षी शाश्वतता को निर्लज्ज करते जाते हैं ।
सदियों से जो इतिहास रचते आये हैं,जो समर्पण देते आये हैं और जो संसार की भौतिकता बनाते आये हैं,अपनी बुनियाद हमेशा ही भूल जाते हैं और भूल जाते हैं कि यही वतन मेरा भी है,अस्तित्व मेरा भी है,हक मेरा भी है और जीना मुझे भी है ।यही सभ्यता साक्षी हैं इनके वजूद की पर ना कहलवाया कभी रचयिता हम हैं क्योंकि यह हक इनको हमने नहीं दिया,ये कैसे हो सकता है कि एक तुच्छ प्राणी इस जगत का निर्माणकर्ता है,बुलन्दियां हैं,अभिमान है,भविष्य है ।
#भले ही विज्ञान ने हमें बताया हो,सजाया हो,बचाया हो और तो और प्रयोगों द्वारा सिद्ध कर हमारे मुँह पर जोरदार तमाचा मारा हो कि सम्पूर्ण मानव प्रजाति का डीएनए एक ही प्रकार से उद्धृत हुआ है,इनमें नाइट्रोजनी क्षारक होते हैं,इनमें म्यूटेशन होता है,इनमें स्पेशियसन होता है,इनमें योग्यतम की उत्तरजीविता होती है,इनमें हार्डी-विनबर्ग सिद्धांत असर करता है पर यह सब हमारे पुराणों में,ग्रंथों में,वेदों में,किताबों में थोड़ी ना लिखा है तो हम क्योंकर मान लें ।हमने तो वर्ण व्यवस्थाएं बनाई हैं जिसमें सबको काम बांट दिया है,वही करना है ।जिसे सुख नहीं मिल रहा है मतलब वह भाग्य में लिखवा कर नहीं लाया,उसे भौतिकता के आनन्द का अधिकार कैसे हो सकता है ।
#वह दालान जहाँ पर दादा के दादा के परदादा नें अपने लहू से सिंचित किया,वह रसोई जहाँ माँ की माँ के संस्कारों की सिसकियाँ सुनाई देती है,जहाँ ऊँगली पकड़े विराट ह्रदय वाला बाप इस धरती पर दौङना सिखाता है,जिसके आंचल में यह सम्पूर्ण प्राणीमात्र समाया है ऐसी माँ कहती-कहती अपने प्राण छोड़ देती है कि बेटी जिस घर में जाओ वहाँ की मर्यादा ना लांघना लेकिन फिर भी वे ही क्यों मोहताज हो जाते हैं उसी मीनारों की नीचे छुपाने को अपना बदन,क्यों बंध जाते हैं सारे ज़माने के संस्कार,क्यों छोटा पड़ जाता है उनका ही आंगन और क्यों सूध नहीं लेता यही संसार?
#मैं लौटकर आऊंगा हर बार हे ! महामानव
मैं ही बनाऊंगा सभ्यताओं की यह मिशाल
ना कभी मांगूंगा अपना अधिकार
तू बस देना मुझे पेट से तार 😭
#हमनें देखा है,समझा है और महसूस किया है इस सदी की वैश्विक महामारी के दौर में, हर सत्ता ने पत्ता खेला है लेकिन दर्द इन्होंने ही झेला है ।बहुत दूर से चली अपने आँगन की आस में एक छोटी सी बच्ची बहुत पास आकर दुनियाँ से औझल हो गई । गोद में अपना वंश और हाथ में अपना अंश लिये,सिर पर सियासतदानों का कर्ज लेकर चलते चलें हैं और चल रहे हैं परन्तु वतन के विधाताओं ने अभी हार नहीं मानी है ।बहुतों ने दुर्गम राहों ने दम तोङा है जिनका मुआवजा दुनियाँ की कोई अदालत नहीं दे सकती,नहीं दे सकती इनके लहू को एक कतरा,नहीं महसूस कर सकती इनके आँसुओ का मोल ।
#बागबां हैं बाग-ए-आलम में बहार ।
फूल सब मुरझा गये,खाली बियाबां रह गया ।।
#मर गये हम पर न आये तुम खबर को ए वतन ।
हौसला सब दिल का दिल में ही मेरी जां रह गया ।।
ना जाने कितनी ही पीढियों से,कितनी ही अनसुनी कहानियों से,कितनी ही गहराई से वो सिसकियाँ कभी बंद नहीं हुई,कम नहीं हुई और हुई तो बस और बस........आख़िरी सांस हुई ।
अरे ! ओ मगरूर में भरे इन्सान, तनिक देख सैलाब ये जहन्नुम का, आशाएँ ये जीवन की,पताकायें ये विजय की......ना हारें हैं,ना हारेंगे और ना हरायेंगे .....बस याद इतना हो सके तो रखना जरूर कि ....
#शोहरतें कोई किसी को इतनी भी ना दे कि भूल जाये इन्सानियत ....
चिराग सभी के बुझते हैं एक दिन ....
ये हवाएँ किसी की नहीं हुई ।।
#जिस वतन की धरा पर ये उम्मीद लगाए बैठे हैं जरा इन्हें बता दो कि वक्त नहीं है हमारे पास वाहयात बातों का,मानस नहीं है अभी हाँ में हाँ भरने का,छापाखाना नहीं है अभी इतिहास लिखने का....अभी हम व्यस्त हैं वतन के बीच बिचौलियापन करने में,हुकूमत की पराकाष्ठा करने में,मानवीय मूल्यों को विभाजित करने में,सत्ताओं में हलचल करने में,,,और हितैषी उगाने में,बंगले उगाने में,जहर उगलने में.....
#लेकिन कर्ताधर्ताओं सनद रहे ....
#नफ़रतें सरहदें बनाती हैं और
वात्सल्यता पुल बनाती हैं ।
@#सहीराम मेहरा व.अ.
और अंत में ........
"#अब कहाँ हूँ,कहाँ नहीं हूँ मैं ।
जिस जगह हूँ वहाँ नहीं हूँ मैं
कौन आवाज़ दे रहा है मुझे
कोई कह दे ...यहाँ नहीं हूँ मैं ।।
#मजदूर

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