विधाता नही पर बनाता हूँ घर सबका
विधाता नहीं पर बनाता हूँ घर सबका... जताता नहीं पर है ये वतन मेरा भी हे ! हुकूमत-ए-वतन , कहाँ मेरा आशियाना??"" कितना अजीब है यह संसार जो ऊँची-ऊंची मीनारें सभ्यता और विकास की बुनियादें होती हैं,किसी राष्ट्र के स्वाभिमान का प्रतीक होती हैं,किसी इंसान के अहम की पराकाष्ठा होती हैं और किसी हुकूमत की अथाह बेमानियां होती हैं पर इन सबसे परे एक बेबसी और लाचारियों के बीच इसी संसार का प्राणी अपने बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करते-करते वक्त-बेवक्त गत हो जाता है फिर भी हमें अपनी लालसाएं और महत्वकांक्षी शाश्वतता को निर्लज्ज करते जाते हैं । सदियों से जो इतिहास रचते आये हैं,जो समर्पण देते आये हैं और जो संसार की भौतिकता बनाते आये हैं,अपनी बुनियाद हमेशा ही भूल जाते हैं और भूल जाते हैं कि यही वतन मेरा भी है,अस्तित्व मेरा भी है,हक मेरा भी है और जीना मुझे भी है ।यही सभ्यता साक्षी हैं इनके वजूद की पर ना कहलवाया कभी रचयिता हम हैं क्योंकि यह हक इनको हमने नहीं दिया,ये कैसे हो सकता है कि एक तुच्छ प्राणी इस जगत का निर्माणकर्ता है,बुलन्दियां हैं,अभिमान है,भविष्य है । #भले ही विज्ञान ने हमें ...